भाजपा ने बीस साल बाद फिर खेला हिंदुत्व कार्ड

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भोपाल । भोपाल लोकसभा सीट पर इस बार पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह और साध्वी प्रज्ञा सिंह ठाकुर के बीच मुकाबला है। भाजपा ने 20 साल बाद फिर एक साध्वी को टिकट देकर हिंदुत्व कार्ड खेला है तो कांग्रेस ने भोपाल के किले को फतह करने के लिए सबसे अनुभवी नेताओं में से एक को जिम्मेदारी दी है। भाजपा ने इस सीट से पूर्व मुख्य सचिव सुशील चंद्र वर्मा, साध्वी उमा भारती, साध्वी प्रज्ञा भारती सहित स्थानीय नेता आलोक संजर को टिकट देकर कई प्रयोग किए तो कांग्रेस ने पूर्व क्रिकेटर नवाब मंसूर अली खां पटौदी, सुरेश पचौरी और अब दिग्विजय सिंह जैसे नेता को प्रत्याशी बनाया है। हालांकि, तीन दशकों से भाजपा का प्रयोग सफल रहा, जबकि कांग्रेस कहीं न कहीं मात खा गई। अबकी बार कांग्रेस ने दिग्विजय सिंह पर भरोसा जताया है, जो विकास के मुद्दे पर वोट मांग रहे हैं। भाजपा ने जो प्रयोग किए, वह अब तक सफल हुए हैं। पूर्व मुख्य सचिव रहे सुशील चंद्र वर्मा को भाजपा ने 1989 में भोपाल सीट से टिकट दी। पूर्व नौकरशाह को टिकट देने का फैसला सही साबित हुआ और वे 1998 तक लगातार जीतते रहे।
     1999 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने बाहरी प्रत्याशी और फायर ब्रांड नेता साध्वी उमा भारती को उम्मीदवार बनाकर साध्वी कार्ड खेला। यह प्रयोग भी सफल हुआ और भाजपा को जीत मिली। 2014 में भाजपा नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में विकास के मुद्दे पर चुनाव मैदान में थी। पहले आडवाणी को भोपाल से टिकट देने की चर्चा चली, उनके मना करने पर आलोक संजर जैसा अपरिचित और लो प्रोफाइल नेता का चेहरा दिया तो मोदी लहर में भोपाल के इतिहास में अब तक के सबसे ज्यादा वोट के अंतर से जीते। वहीं कांग्रेस के अभी तक सभी प्रयोग असफल साबित हुए हैं। 1991 में राजीव गांधी ने नवाब मंसूर अली खां पटौदी को भेजा। कांग्रेस का अनुमान था कि भोपाल नवाब खानदान से जुड़े होने के कारण उन्हें जीत मिलेगी, लेकिन सुशील चंद्र वर्मा ने उन्हें एक लाख से ज्यादा वोट से हराया। साध्वी उमा भारती के सामने कांग्रेस ने वरिष्ठ नेता और भोपाल से पढ़े सुरेश पचौरी को मैदान में उतारा। कांग्रेस ने साध्वी के खिलाफ स्थानीयता का प्रयोग किया था, लेकिन यह टेस्ट भी सफल नहीं हुआ। 2014 में जब भाजपा ने स्थानीय नेता आलोक संजर को टिकट दिया तो कांग्रेस ने भी स्थानीयता का कार्ड चलकर पीसी शर्मा को चुनाव लड़ाया, लेकिन शर्मा को संजर से तीन लाख से ज्यादा वोट से हार का सामना करना पडा।