देश फेस रिकग्निशन तकनीक का दुरुपयोग रोकने में सक्षम नहीं

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नई दिल्ली । देश में टॉप साइबर लॉ एक्सपर्ट पवन दुग्गल ने कहा, 'भारत में फेस रिकग्निशन (चेहरे को पहचानने वाली) तकनीक के मिसयूज को रोकने के लिए कोई कानूनी तंत्र नहीं है। सूचना प्रौद्योगिकी कानून में खास तौर से इस टेक्नॉलजी के दुरुपयोग से निपटने का कोई तरीका नहीं है।' उन्होंने कहा, 'शायद इस टेक्नॉलजी के सही इस्तेमाल से होने वाले फायदे के कारण इसके इस्तेमाल पर कोई प्रतिबंध भी नहीं है क्योंकि इससे अपेक्षित समय से काफी कम समय में फोटो और विडियो में लोगों पहचान हो जाती है। 'पिछले साल अप्रैल में फेस रिकग्निशन सिस्टम के जरिए दिल्ली पुलिस ने महज चार दिन में 3,000 लापता बच्चों की पहचान की। हालांकि कानून लागू करने वाली एजेंसियों के लिए अपराध से निपटने और लापता लोगों की पहचान करने के साथ-साथ, कारोबार के लिहाज से भी इस प्रौद्योगिकी के फायदे से इनकार नहीं किए जा सकते हैं, लेकिन यह टेक्नॉलजी का दुरुपयोग है जिससे देश के नागरिकों के लिए समस्या पैदा हो सकती है। उन्होंने कहा, 'भारत में फेस रिकग्निशन डेटा के संग्रहन को रेग्युलेट करने के लिए कोई फ्रेमवर्क नहीं है। साइबर अपराधी इसी परिस्थिति का फायदा उठा रहे हैं और वे डार्क नेट पर ऐसे डेटा उपलब्ध करवा रहे हैं। दुग्गल ने कहा, 'फिलहाल इस प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल कोई भी बिना डरे कर सकता है क्योंकि उसे किसी हानिकर कानूनी परिणाम का डर नहीं होगा। ऐसे में हम जितनी जल्दी फेस रिकग्निशन टेक्नॉलजी को रेग्युलेट करने के लिए प्रभावी कानूनी तंत्र मुहैया करवाने में सक्षम होंगे, यह देश और इसके नागरिकों के लिए उतना ही बेहतर होगा। 'माइक्रोसॉफ्ट प्रेजिडेंट ब्रैड स्मिथ ने दिसंबर में एक ब्लॉग पोस्ट में इस बात का जिक्र किया कि इस प्रौद्योगिकी के कुछ उपयोग से पूर्वाग्रही फैसलों का खतरा बढ़ सकता है। लोगों की निजता में दखलंदाजी हो सकती है। इसके अलावा, प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल व्यापक स्तर पर निगरानी के लिए किए जाने पर लोकतांत्रिक स्वतंत्रता का हनन हो सकता है। 

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